सुर्ख़ियाँ...

राग दरबारी

पहचान की राजनीति के अखाड़े में असम

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असम हिंसा से प्रभावित लोगअसम के पश्चिमी ज़िलों में जारी हिंसा को बोड़ो बनाम बांग्लादेशी के नज़रिए से देखना समस्या का सरलीकरण करना और पूरी समस्या को सांप्रदायिक रंग देना होगा।

श्रमिक असंतोष का ज्वालामुखी

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मारुति का मानेसर प्लांटहरियाणा के मानेसर स्थित मारूति उद्योग लिमिटेड की फैक्ट्री में हुई हिंसा एक संकेत भी है और महत्वपूर्ण चेतावनी भी। संकेत इस बात का है कि सरकारी संरक्षण में उद्योगपतियों और उनके प्रबंधन का रवैया दिनोंदिन दमनात्मक हो रहा है जिससे श्रमिक असंतोष बढ़ता जा रहा है।

मुलायम सिंह का मध्यावधि-राग

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मुलायम सिंह यादवये सब जानते हैं कि मुलायम सिंह यादव राजनीति के अखाड़े के बड़े पहलवान हैं और मुक़ाबला जीतने के सारे दाँव उनको आते हैं। इसीलिए जब उन्होंने तीन महीने में तीन बार मध्यावधि चुनाव की बात कही तो ये चर्चा चल पड़ी कि आख़िर उनके इरादे क्या हैं, वे क्या चाहते हैं?

बीजेपी का टोटल सरेंडर?

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बीजेपी नेताभारतीय जनता पार्टी शक्तिशाली केंद्र और सख़्त राष्ट्र (हार्ड स्टेट) की वकालत करती है। वह ये कहते नहीं अघाती कि देश का नेतृत्व ऐसे हाथों में होना चाहिए जो कड़े फैसले लेने की सामर्थ्य रखता हो। इसी आधार पर उसके नेता इंदिरा गाँधी की प्रशंसा और मनमोहन सिंह की निंदा करते रहे हैं। वह देश को देश की तरह नहीं देखती और उसमें हमेशा पौरूष और पराक्रम तलाशती रहती है। उसका ये अति राष्ट्रवादी सोच अपने आप में हीनता और प्रतिक्रियावाद की मिसाल है। मगर यदि हम इस विषय को यहीं छोड़कर ये देखने की कोशिश करें कि वह अपने ही दर्शन और आदर्शों पर आज कितना खरा उतरती है तो शायद वीर सावरकर और हेडेगेवार से लेकर गोलवलकर और दीनदयाल उपाध्याय तक निराशा से सिर पीट लेंगे। 
सच तो ये है कि उसकी मौजूदा हालत को देखकर हालत देखकर तरस आता है। वह कहीं से संगठित और शक्तिशाली बीजेपी नहीं लगती। विचार और दर्शन के नाम पर उसके पास कुछ नहीं बचा है, वह काँग्रेसी नीतियों की एक घटिया कार्बन कॉपी बनकर रह गई है। स्वदेशी का उसने उसी समय वध कर दिया था जब वह केंद्रीय सत्ता पर काबिज़ थी। अब उसके पास बचा है तो केवल छद्म हिंदूवाद। इस हिंदुत्व में हिंदुओं की चिंता बिल्कुल भी नहीं है। हाँ, उन्हें डराकर और अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा पैदा करके सत्ता पर काबिज़ होने की संकुचित राजनीति इसमें ज़रूर है। यही वजह है कि वह नरेंद्र मोदी को हिंदू ह्रदय सम्राट की तरह पेश करने के लिए विवश है और वह भी उनके सामने साष्टांग दंडवत होकर। लेकिन बदले हुए परिवेश में उसका ये दाँव भी चल पाएगा इसमें संदेह है। 
विचारधारा से लेकर कार्यक्रमों तक बीजेपी की ढेर सारी कमज़ोरियाँ हैं, मगर फिलहाल सबसे बड़ी कमज़ोरी तो उसका नेतृत्व है। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद शिखर पर जो शून्य पैदा हुआ है उसे भरने में पार्टी पूरी तरह से अक्षम साबित हुई है। उसका वर्तमान नेतृत्व पूरी तरह से बँटा हुआ और लिजलिजा है। न तो उसकी दृष्टि साफ़ है, न उसमें दृढ़ता है और न ही चीज़ों को सुधारने की कोई इच्छाशक्ति। वह कभी दबाव में तो कभी प्रलोभन में एक के बाद एक ऐसे फैसला कर रहा है जो पार्टी की छवि और रीति-नीति को लगातार नुकसान पहुँचा रहा है। ऐसा लगता है कि वह सत्ता के लिए किसी भी तरह के व्यक्ति या निहित स्वार्थ के सामने समर्पण के लिए तैयार है। वह कोई कड़ा फैसला नहीं ले पाता, क्षत्रपों के हाथ में खेलता है और रीति-नीति का खयाल न करके फौरन आत्मसमर्पण के लिए राजी हो जाता है। उत्तरप्रदेश के कुशवाहा प्रकरण और फिर झारखंड चुनाव के दौरान तो ये दिखा ही, मोदी को भावी  प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करके और अब कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का फैसला लेकर भी उसने यही साबित किया है।  
दिलचस्प बात ये है कि इस स्थिति से उबरने की कोई योजना और रणनीति भी दिखलाई नहीं देती। और तो और कोई छटपटाहट, कोई बेचैनी के दर्शन भी नहीं हो रहे। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तो विभाजित है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बार-बार के दखल से स्थितियाँ और भी खराब हो रही हैं। इसी का नतीजा है कि और तो और सहयोगी दलों ने भी उस पर प्रहार करने और उसमें तोड़-फोड़ की कोशिशें शुरू कर दी हैं। यानी अब ऐसा स्थिति निर्मित हो गई है कि बीजेपी की संगठनात्मक, विचारधारात्मक और नेतृत्व संबंधी कमज़ोरियाँ का फायदा उनके विरोधी ही नहीं, सहयोगी भी उठाने की फिराक में हैं। किसी भी पार्टी के लिए शायद इससे बुरी स्थिति कुछ और नहीं हो सकती।
दरअसल, बीजेपी की हालत देखने से यही लगता है कि इसके कर्णधारों ने उसे भाग्य के हाथों में छोड़ दिया है या फिर वे इस उम्मीद में ज़िंदा हैं कि यूपीए सरकार के पाप उसके उद्धार का मार्ग प्रशस्त करेंगे। ये टोटल सरेंडर नहीं तो और क्या है...?

कलाम का राजधर्म?

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एपीजे अब्दुल कलामपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम एक देशभक्त, उदारमना, स्वप्नदर्शी, सीधे-सादे व्यक्ति और उच्च कोटि के वैज्ञानिक के रूप में जाने जाते हैं। हाल में राष्ट्रपति पद पर दावेदारी को लेकर हुए जनमत सर्वेक्षणों से ज़ाहिर हो गया कि लोकप्रियता के पैमाने पर भी वे काफी आगे हैं। इससे साबित होता है कि जाति, धर्म और भूगोल की सीमाएं उनके चाहने वालों के लिए मायने नहीं रखतीं और ये उनके व्यक्तित्व का ही कमाल है। लेकिन उनके संस्मरणों की किताब द टर्निंग पॉइंट कलाम के कुछ कमज़ोर पहलुओं की ओर भी इशारा करती है। ख़ास तौर पर उनके राष्ट्रपति के रूप में लिए गए फैसलों से जुड़ी जानकारी के संदर्भ में। 
टर्निंग पॉइंट के ज़रिए कलाम ने अपने कार्यकाल के तीन बड़े विवादों पर अपना पक्ष सामने रखा है। सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री न बनने के संदर्भ में कही है। संघ परिवारी और सुब्रमण्यम स्वामी ये प्रचारित करते रहे हैं कि राष्ट्रपति कलाम ने उनकी नागरिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उन्हें प्रधानमंत्री बनाने से इंकार कर दिया था और इसीलिए सोनिया गाँधी को पीछे हटना पड़ा था। अब कलाम ने ये स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने तो सोनिया की नियुक्ति की चिट्ठी तैयार करके रखी हुई थी और उन्हें तब हैरत हुई थी जब सोनिया ने खुद के बजाय मनमोहन सिंह का नाम उनके सामने रखा। कलाम के स्पष्टीकरण से झूठ का पर्दाफाश तो हुआ है मगर ये सवाल भी उठा है कि आख़िरकार आठ साल तक उन्होंने ये बात क्यों छिपाए रखी। ये ठीक है कि राष्ट्रपति की मर्यादा को ध्यान में रखकर वे उस समय चुप रह गए होंगे, मगर पद से हटने के कुछ समय बाद तो उन्हें ऐसा करना चाहिए था, फिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, इतने समय तक चुप रहने और अब उसे किताब के ज़रिए ज़ाहिर करने के पीछे क्या मक़सद है?
कलाम के काम पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाला दूसरा विवाद गुजरात दंगों से जुड़ा है। दुनिया जानती है कि जब पूरा देश गुजरात के सुनियोजित नरसंहार से उद्वेलित था तो राष्ट्रपति ने चुप रहना बेहतर समझा। कलाम साहब दस साल बाद भी चुप ही हैं। उन्होंने केवल इतना बताया है कि जब वे गुजरात जाना चाहते थे तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे पूछा था कि क्या ऐसे समय वहाँ आपका जाना ज़रूरी है, जिसका मतलब यही था कि वे वहाँ न जाएं। यात्रा न करने के लिए उन पर दूसरे तरीकों से भी दबाव डाले गए थे। ये भी एक ऐसा तथ्य है जिस पर बहुत पहले रोशनी डाली जानी चाहिए थी। वाजपेयी एक तरफ तो नरेंद्र मोदी को राजधर्म की नसीहत दे रहे थे और दूसरी राष्ट्रपति को वहाँ जाने से रोक रहे थे क्योंकि इससे उनकी सरकार का धर्मसंकट बढ़ता था। ये अच्छी बात है कि कलाम ने उनकी नहीं सुनी और गुजरात गए मगर न तो उन्होंने उन्हें रोके जाने की कोशिशों के बारे में कभी बताया और न ही गुजरात के नरसंहार में राज्य सरकार की भूमिका पर कोई टिप्पणी की। यहाँ तक कि अभी भी उनकी किताब चुप ही है। सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रपति का राजधर्म क्या यही है? क्या कलाम की चुप्पी ने दंगा कराने वालों के हौसलों को नहीं बढ़ाया? बेशक वे कड़ी टिप्पणी न करते, मगर अफसोस तो ज़ाहिर कर ही सकते थे?   
कलाम के कार्यकाल का तीसरा विवाद आधी रात को बिहार विधानसभा भंग करने के मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पर दस्तखत करने का था। उन पर सरकार का दबाव पड़ा और वे उसके सामने झुक गए। मगर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को असंवैधानिक करार देकर खारिज़ कर दिया और इससे सरकार और राष्ट्रपति दोनों की किरकिरी हुई। अव्वल तो कलाम ने दबाव में आकर ऐसा किया क्यों और अगर किया तो बाद में स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया कि उन पर दबाव डाला गया था। इतने समय तक इस राज़ को छिपाने के गुनहगार भी वे माने जाएंगे। ग़ौरतलब है कि ठीक ऐसी ही परिस्थिति में पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सरकार का दबाव नहीं माना था और सरकार का प्रस्ताव लौटा दिया था। 
सत्य अगर समय पर न बोला जाए तो उसकी अहमियत नहीं रह जाती। वह केवल संस्मरणों का हिस्सा बन जाता है या फिर अपनी किताब को बेस्टसेलर बनाने का नुस्खा। इसलिए कलाम साहब ने सत्य के साथ इंसाफ़ नहीं किया है और राजधर्म की कसौटी पर भी वे खरे नहीं उतरे हैं। इस समय जबकि राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया चल रही है बार-बार ये कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति केवल रबर स्टाम्प है। मगर कलाम के कार्यकाल में घटी बड़ी घटनाएं और उनमें उनकी भूमिका बताती है कि राष्ट्रपति की भूमिका उतनी भी महत्वहीन नहीं है और एक विवेकशील, साहसी और स्वतंत्र निर्णय ले सकने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति बनना चाहिए, ताकि राजधर्म की आवश्यकताओं को पूरा करने में वह भी अपना योगदान कर सके।

आगे अंधा मोड़ है?

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नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमारबिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाईटेड के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार की अवसरवादी धर्मनिर्पेक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं और आगे भी वह संदिग्ध रहेगी, मगर अब ये लगभग तय है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को रोक दिया है, ब्लॉक कर दिया है। नीतीश ने इस मामले में इतना कड़ा रुख़ अख़्तियार कर लिया है कि बीजेपी और संघ परिवार मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने से पहले सौ बार सोचेगा। उसे सोचना ही पड़ेगा क्योंकि ऐसा करने का मतलब है अपने सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी दल को खो देना और अपनी सत्ता संभावनाओं पर भी ताला लगा लेना। बीजेपी को कभी अपने दम पर बहुमत मिलना नहीं है और गठबंधन राजनीति के इस दौर में जेडीयू के बिना एनडीए का अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा।
हालाँकि नरेंद्र मोदी के मामले में नीतीश पहले से शत्रु-भाव प्रदर्शित करते रहे हैं, मगर संघियों को इसका अनुमान नहीं था कि वे इतनी जल्दी और इतने आक्रामक ढंग से खुल्लमखुल्ला ऐसी कड़ी शर्त रख देंगे कि उनसे न निगलते बनेगा और न उगलते। इससे उनकी सारी योजनाएं और उम्मीदें ध्वस्त हो गई हैं। मुंबई बैठक में गडकरी और मोदी की जोड़ी बनाकर संघ ने सोच लिया था कि उसने वाजपेयी-आडवाणी का विकल्प दे दिया है। मगर पार्टी के अंदर ही उसे स्वीकार नहीं किया गया और ये आडवाणी-सुष्मा ने जगज़ाहिर भी कर दिया। फिर भी संघ को लगा होगा कि इसे अनुशासन के डंडे से मनवा लिया जाएगा, लेकिन जेडीयू और नीतीश को कैसे काबू में करे, उन पर तो उसका कोई वश नहीं है। उनको नियंत्रण करने की कोई भी चाबी उनके पास नहीं है। बिहार में नीतीश की सत्ता पर पूरी पकड़ है। यही नहीं, बीजेपी भी राज्य में जेडीयू की बी टीम की तरह काम करती है। वे बीजेपी को तोड़ने की पूरी सामर्थ्य भी रखते हैं। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के बयानों में बीजेपी के एक धड़े का नीतीश प्रेम कोई छिपी हुई बात नहीं है। ऐसे में नीतीश को अनदेखा करके वह अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकता।
दरअसल, पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण करने को आतुर नरेंद्र मोदी ने अपनी राह में खुद ही काँटे बिछा लिए हैं। एक तो गुजरात दंगों में उनकी भूमिका की वजह से उनका दामन पहले ही दाग़दार रहा है। लेकिन इस तथ्य को भूलकर उन्होंने सोचा रास्ता साफ़ है और पूरी स्पीड से गाड़ी दौड़ा दी, जिससे गाड़ी अनियंत्रित हो गई। पहली दुर्घटना उन्होंने पार्टी के अंदर ही कर डाली। संजय जोशी के बहाने उन्होंने पार्टी के दूसरे नेताओं को किनारे करने और खुद का वर्चस्व स्थापित करने की जो चाल चली उससे एक बड़ा हिस्सा उनसे आतंकित और नाराज़ दोनों हो गया और उसने मोदी का रास्ता रोकने के लिए बाधाएं खड़ी करनी शुरू कर दीं। 
दूसरी दुर्घटना वे राजकोट में नीतीश कुमार को जातिवादी कहकर कर बैठे। अपने सबसे बड़े सहयोगी दल के नेता को चिढ़ाने की जो हरकत उन्होंने की उसकी तीखी प्रतिक्रिया तुरंत उन्हें मिल गई। नीतीश ने उन्हें खुले आम सांप्रदायिक करार देने में कोई देरी नहीं की और फिर उनकी दावेदारी को ठुकराकर तो जैसे काम पूरा ही कर दिया। उनके इस क़दम में बीजेपी के मोदी विरोधी खेमे का हाथ भी ज़रूर होगा। उसने मोदी को पटखनी देने के लिए नीतीश नामक तुरूप के पत्ते का इस्तेमाल किया और नीतीश को सा करने में कोई आपत्ति नहीं हुई होगी क्योंकि ये उनके भी हित में जाता है। इस तरह मोदी अंदर और बाहर दोनों तरफ से हुए वार से खेत रहे।
वास्तव में अहमन्य, बड़बोले और अड़ियल नरेंद्र मोदी की गाड़ी अब एक अंधे मोड़ पर जा पहुँची है। सामने का रास्ता बंद है और दोनों तरफ गहरी खाईयाँ हैं। उनके विरोधी ही नहीं, सहयोगी और मार्गदर्शक भी उनके लिए बद्दुआएं माँग रहे हैं। राज्य से लेकर राष्ट्रीय तक उन्होंने अपने शत्रुओं की फौज खड़ी कर ली है। ऐसे में एकमात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही उनकी नैया को पार लगा सकता है। संघ उन्हें फिर भी प्रधानमंत्री के दावे के रूप में पेश कर सकता है मगर ऐसा करते हुए उसे एनडीए को भूलना होगा। यानी बीजेपी मोदी के नेतृत्व में अपने दम पर चुनाव लड़े और अच्छी सीटें जीतकर चुनाव बाद गठबंधन बनाए। लेकिन इसमें भी उसे बहुत बड़ा जोखिम उठाना पड़ेगा, क्योंकि दूसरे दलों के कंधे पर चढ़कर वोट बढ़ाने का लाभकारी फार्मूला वह नहीं आज़मा पाएगी। इसका मतलब ये हुआ कि न केवल मोदी बल्कि बीजेपी भी अंधे मोड़ पर खड़ी है।

क्या चूक गई काँग्रेस?

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मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, सोनिया गांधी

प्रणब मुखर्जी के लिए राष्ट्रपति भवन का रास्ता साफ़ हो गया है और ये काँग्रेस तथा यूपीए-2 दोनों के लिए एक बड़ी राहत की बात कही जा सकती है। हालाँकि इस क्रम में ममता बैनर्जी से रिश्ते ख़राब हो गए हैं और शायद वे कभी नहीं सुधरेंगे, क्योंकि ममता बैनर्जी में सुधार की कोई गुंज़ाइश नज़र नहीं आती। अलबत्ता, बहुत से लोगों का मानना है कि राष्ट्पति पद के लिए उम्मीदवार का चयन करते वक्त काँग्रेस ने हाथ आए एक बड़े अवसर को गँवा दिया। उसके पास मौका था कि अत्यधिक अलोकप्रिय हो गए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से रिटायरमेंट देकर राष्ट्रपति भवन भेज देती। मुलायम सिंह यादव और ममता बैनर्जी ने बेशक प्रधानमंत्री का नाम राष्ट्रपति पद के लिए सुझाते वक्त मन का गुबार और गुस्सा निकाला होगा, मगर उन्होंने काँग्रेस नेतृत्व के लिए एक बेहतरीन अवसर भी दे दिया था, मनमोहन सिंह से मुक्ति पाने का, जिसका इस्तेमाल उसने नहीं किया। 
यूपीए और काँग्रेस के अंदर भी बहुत से लोग मानते हैं कि ये नेत़ृत्व में परिवर्तन का सही वक्त है । मनमोहन सिंह एक नेता और प्रधानमंत्री दोनों के तौर पर नकारा और निस्तेज सिद्ध हो चुके हैं। राजनीतिक नेतृत्व देने की काबिलियत तो उनके पास पहले से ही नहीं थी, मगर अर्थव्यवस्था के संकट ने आर्थिक मामलों को सुलझाने की उनके हुनर पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। वे सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके हैं। न तो उनकी सरकार में चलती है और न ही पार्टी में। वे सबसे भ्रष्ट सरकार के मुखिया के रूप में जाने जाते हैं। पॉलिसी पैरालिसिस की शिकायत तो हर कोई कर रहा है। अगर कोई सर्वेक्षण करवाया जाए तो शायद पिछले डेढ़-दो दशक में वे सबसे अलोकप्रिय प्रधानमंत्री भी होंगे। ऐसे में बेहतर तो यही होता कि काँग्रेस अपने एक सबसे सक्रिय और कुशल नेता यानी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन का बंधक बना देने के बजाय उसका इस्तेमाल करती और सबसे अलोकप्रिय नेता को वहाँ भेजकर उसकी ससम्मान विदाई की व्यवस्था कर देती। 
लेकिन लगता है कि दस जनपथ को प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह का विकल्प नहीं मिल रहा। उसे प्रधानमंत्री पद पर एक ऐसा वफादार नेता चाहिए जिससे उसे चुनौती मिलने का कोई ख़तरा न हो और वह जब चाहे उसे हटा सके। ज़ाहिर है कि प्रणब बाबू को वह ऐसा विकल्प नहीं मानता और इसकी वजह उसके अतीत के अनुभव हैं। चिदंबरम या एंटनी में भी उसे ये काबिलियत और भरोसेमंदी नहीं दिखती होगी और इसीलिए वह मौजूदा व्यवस्था को बदलने का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहता। दूसरे, ये भी मुमकिन है कि 2014 के चुनाव के कुछ पहले वह राहुल गाँधी की ताजपोशी का इरादा रखता हो, इसलिए फिलहाल उसने नेतृत्व परिवर्तन न करने का मन बनाया हो। हालाँकि बहुत से लोगों का तो यहाँ तक कहना था कि राहुल को इसी समय प्रधानमंत्री बना देना चाहिए था, क्योंकि क्या पता फिर कोई मौका मिले न मिले। ये भी सब मानते हैं कि अगले आम चुनाव में काँग्रेस का डेढ़ सौ के आसपास सीटें लाना बहुत मुशिकल होगा और अगर वह संख्याबल में कमज़ोर पड़ती है तो राहुल को 2019 तक इंतज़ार करना पड़ सकता है जो कि बहुत लंबा वक्त होगा। मगर इसे भी नज़रअंदाज़ कैसे किया जा सकता है कि इस समय सरकार इतने सारे संकटों और हमलों से जूझ रही है कि उसके लिए ऐसा करना उबलती कढ़ाई में हाथ डालने जैसा होता। कोई भी माँ अपने बेटे को और कोई भी पार्टी अपने भविष्य को इस तरह के जोखिम में नहीं डाल सकती। राहुल के लिए तो आदर्श समय देखा जाएगा ताकि उन्हें किसी तरह की कोई दिक्कत न हो। 
इस लिहाज़ से कहा जा सकता है कि राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का काँग्रेस के सामने ये आधा मौका था, जिसे वह पूरे में तब्दील कर सकती थी। लेकिन इसके लिए पुख़्ता योजना और रणनीति की ज़रूरत थी, क्योंकि उसी के दम पर मौके का फ़ायदा उठाया जा सकता था। रही बात जोखिम की तो राजनीति में जोखिम भी उठाने पड़ते हैं और ये भी ध्यान में रखना होता है कि कोई भी स्थिति सर्व-सुरक्षित नहीं होती। राजीव गाँधी विशाल बहुमत के साथ जीतकर भी तीन साल के अंदर मुसीबतों में फँस गए थे और अंतत सत्ता से बाहर भी कर दिए गए। मगर मुश्किल ये है कि  काँग्रेस का नेतृत्व इतना कमज़ोर और भ्रमित है कि आधे को पूरे में बदलने की न तो उसमें कूवत है और न ही हिम्मत। ऐसे में तदर्थवाद की शिकार काँग्रेस इसी तरह संकट दर संकट अपना रास्ता तय करती रहेगी।

उदारवाद के शौचालय

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मोंटेक सिंह अहलुवालियायोजना आयोग के दो शौचालयों पर पैंतीस लाख रुपए खर्च हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। हमारे नेता और अफसर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए इसी तरह अपनी जीवन शैली को बनाए रखने या अपनी शान बढ़ाने के लिए उड़ाते रहते हैं। दफ्तर और बंग्ले के रख-रखाव से लेकर सुरक्षा आदि पर मोटी रकम उन पर खर्च होती है। इस सब पर उँगलियाँ भी उठती हैं, मीडिया में ख़बरें भी छपती हैं, मगर कुछ बदलता नहीं। सब कुछ पहले वाले अंदाज़ में चलता रहता है। हुक्मरानों और साहबानों को कोई फर्क नहीं पड़ता और इसकी सबसे बड़ी वजह वो मानसिकता है जिसके चलते उन्हें ऐसा करते वक्त किसी तरह का अपराधबोध नहीं होता। उन्हें कतई नहीं लगता कि वे एक ग़रीब मुल्क की ग़रीब जनता के नुमांइदे हैं या उसकी ख़िदमत करना ही उनकी ज़िम्मेदारी है। उनके लिए सत्ता सेवा नहीं भोग की चीज़ है और उन्हें लगता है कि इस तरह की शाहखर्ची उनका हक़ है। वैसे भी इस तरह की सुख-सुविधाओं का कानूनी तौर पर प्रावधान होता है, इसलिए इसमें किसी तरह का संकोच वे क्यों करें। उदारवाद के दौर में इस प्रवृत्ति को और भी बढ़ावा मिला है। सादगी पिछड़ेपन की निशानी बन गई है और दिखावा मार्केटिंग का ज़रिया। 
योजना आयोग के शौचालयों पर हुए खर्च पर जब मीडिया में शोर मचा तो मोंटेक सिंह अहलुवालिया की प्रतिक्रिया इसी मानसिकता से प्रेरित रही। उन्होंने इसे ज़रूरी और जायज़ खर्च बताया। इस तरह के शौचालयों की आवश्यकता को भी उन्होंने रेखांकित किया। ये वही मोंटेक सिंह अहलुवालिया हैं जो मानते हैं कि शहरों में बत्तीस रुपए रोज़ खर्च करने वाला ग़रीब नहीं है और गाँव का कोई व्यक्ति अगर छब्बीस रुपए रोज़ खर्च कर सकता है तो उसे ग़रीब नहीं माना जा सकता। योजना आयोग के जिस उपाध्यक्ष की चिंता हर तरह की सब्सिडी को ख़त्म करना हो, जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रशिक्षित हुआ हो और विश्व बैंक द्वारा सुझाई गई आर्थिक नीतियों को लागू करना जिसका परम लक्ष्य हो, उससे और कोई अपेक्षा की भी नहीं जा सकती थी। वह तो मानकर ही चलता है कि ये दुनिया दो हिस्सों में बँटी हुई है। एक में अमीर रहते हैं और दूसरी में ग़रीब। अमीरों को हर तरह के सुख भोगने और सुविधाओं से युक्त जीवन जीने का हक़ है और ग़रीब उनके टुकड़ों पर पलें। ये उन आर्थिक नीतियों का मूल दर्शन है जिसे मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह की जोड़ी पिछले बीस सालों से पूरी निष्ठा और ईमानदारी से इस देश पर थोपने में लगी हुई है। 
योजना आयोग देश की तरक्की का नक्शा तैयार करने का काम करता है। उम्मीद की जाती है कि तरक्की की इन योजनाओं के दायरे में एक सौ बीस करोड़ लोग होंगे न कि संपन्न और मध्यमवर्ग के बीस करोड़ लोग। उसे समाज के हर तबके के बारे में सोचना चाहिए और तभी वह सर्व हितकारी योजनाएं बना सकता है। मगर उदारवाद के शौचालय यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक दूसरे तरह की विचार-विष्ठाएं विसर्जित कर रहे हैं और हमारे आर्थिक नीतिकार उसी को सिर पर उठाए देश का उद्धार करने का दावा करते हैं। उनके इन उदारवादी शौचालयों के मुताबिक योजनाएं समाज नहीं बाजार और उद्योग केंद्रित होनी चाहिए और समाज का विकास सरकार का काम नहीं है, उसे भी बाज़ार की शक्तियाँ अंजाम देंगीं। योजना आयोग के कर्णधार उनके विचारों के एक सौ एक फीसदी कायल हैं और इसीलिए उन पर प्राणपण से अमल करने में जुटा हुआ है। 
कहने का मतलब ये है कि सवाल योजना आयोग के खर्चीले शौचालयों का नहीं है। सवाल उदारवाद के उन शौचालयों का है जो सरकार से लेकर उद्योग जगत तक हर जगह धड़ल्ले से खुलते जा रहे हैं और कोई उनका नोटिस नहीं ले रहा। किसी को समझ में नहीं आ रहा कि इनकी वजह से हो रहा नुकसान कितना ख़तरनाक है और इसे कैसे रोका जाए। और अगर कुछ लोग समझ भी पा रहे हैं तो कुछ कर नहीं पा रहे, क्योंकि उदारवाद को लागू करने वाली ताकतें कहीं ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से काम कर रही हैं।

समर्थों के चंगुल में सुशासन बाबू

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ब्रहमेश्वर सिंहये अभी किसी को पता नहीं कि कुख्यात रणवीर सेना के कुख्यात सरगना ब्रम्हेश्वर सिंह मुखिया को किसने मारा। उसे मौत के घाट उतारने वाले जातीय वर्चस्व की राजनीति से जूझने वाले लोग थे या फिर सत्ता में बैठे लोगों ने ही ये काम करवा दिया। वो सवर्ण जातियों की आपसी रंजिश का शिकार भी हो सकता है और स्वार्थों के टकराव का भी। मगर इतना तय है कि उसका मारा जाना आँसू बहाने का सबब नहीं बनता। बीसियों नरसंहार को अंजाम देने और 277 हत्याओं का आरोपी ये आतंकवादी किसी भी तरह की हमदर्दी का हक़दार नहीं बनता। उसे सिर्फ और सिर्फ सज़ा मिलनी चाहिए थी, ये कानूनी तरीके से मिलती तो बेहतर होता मगर ऐसा न हो पाना बताता है कि बिहार की जातीय गोलबंदी से इंसाफ़ के मंदिर भी मुक्त नहीं हैं और हताश लोग अकसर हिंसा का जवाब हिंसा से देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। 
लेकिन विडंबना देखिए कि ब्रम्हेश्वर के संहार पर आँसू बहाए गए। न केवल आँसू बहाए गए बल्कि हिंसक प्रदर्शन भी किए गए। जमकर तोड़-फोड़ और आगज़नी हुई। राज्य सरकार की ओर से इसके लिए पूरी छूट दी गई। चिंता की बात है कि ब्रम्हेश्वर जैसे हत्यारे के लिए समाज में इतनी प्रतिष्ठा है कि उसके लिए लोग सड़कों पर उतरते हैं। ये बताता है कि बिहार अभी बदला नहीं है। बल्कि इसके उलट लोग आशंकाएं तक जता रहे हैं कि कहीं इससे नए जातीय संघर्ष को शह न मिल जाए। 
दरअसल, जातीय हिंसा को बिहार की राजनीति संभालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है और मौका पड़ने पर उसका इस्तेमाल करती है। ब्रम्हेश्वर सिंह अगर कानून की गिरफ़्त से निकल पाया था तो इसकी वजह यही थी कि समर्थ जातियों के नेता उसे बचाने में लगे थे और उनके साथ गठजोड़ करके राजनीति करने वाले पिछड़े नेता भी इसमें मददगार बने हुए थे। नीतीश कुमार यूँ तो पिछड़ी जातियों के नेता कहे जाते हैं मगर उन्होंने अपने साथ कमज़ोर जातियों पर अत्याचार ढहाने वालों की जमात इकट्ठी कर रखी है और इनमें से कई तो कुख्यात बाहुबली भी हैं। जातीय सेना के राजनेताओं से संबंधों की पड़ताल करने के लिए बनाए गए अमीरदास आयोग को बंद करवाने वाले भी नीतीश कुमार ही हैं। वे घबराए हुए थे क्योंकि जस्टिस अमीरदास की इस सूची में सबसे ऊपर उनके उपमुख्यमंत्री और बीजेपी के नेता सुशील मोदी का ही नाम था। इसके अलावा बीजेपी नेता सी पी ठाकुर और मुरली मनोहर जोशी के नाम भी शामिल थे। यही नहीं, समर्थ जातियों के सहारे राजनीति करने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी के नेता अखिलेश सिंह के संबंध भी जाति सेनाओं से पाए गए थे। 
साफ़ है कि बिहार की राजनीति मंडल आयोग की वजह से पैदा हुई उथल-पुथल के बावजूद अभी भी समर्थ जातियों की गिरफ्त में है और पिछड़ी जाति के नेता भी कमोबेश उन्हीं का खेल खेल रहे हैं। पिछड़ों में पड़ी फूट का फ़ायदा इन जातियों के नेताओं ने बखूबी उठाया है और वे कमोबेश अपना वर्चस्व बनाए रखने में सफल हुए हैं। ये और बात है कि उन्होंने अपनी आक्रामकता कुछ समय के लिए स्थगित कर दी क्योंकि सत्ता में आने के बाद पिछड़ी जातियाँ भी उनके वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में आ गई थीं। जेडीयू और बीजेपी के गठजोड़ ने कमजोर जातियों को कमज़ोर कर दिया है। पिछड़ों, दलितों और पसमांदा मुसलमानों को बाँटने से बेशक नीतीश कुमार का चुनावी आधार मज़बूत हो गया मगर इन जातियों की एकजुटता ख़त्म हो गई, जो कि बड़ी जातियों के लिए लाभ की स्थिति बन गई। इसका एक प्रमाण तब भी मिला था जब ताकतवर जातियों के दबाव में नीतीश ने भूमि सुधार के अपने वायदे को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। 
ब्रम्हेश्वर की मौत के बहाने बिहार की राजनीति का पहिया एक बार फिर से पीछे की ओर घुमाने की कोशिश की जाएगी। सामंती चरित्र वाली समर्थ जातियाँ सरकार पर और दबाव डालेंगी और सत्ता में बड़े हिस्से की माँग करेंगी। इसका मतलब होगा नीतीश सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी होना। उन्हें या तो  समर्थ जातियों को ज्यादा सहयोग और संरक्षण देना होगा या फिर टूटकर बिखर जाना होगा। नीतीश कुमार अभी तक सुशासन बाबू की एक नकली छवि को लेकर राज करते आ रहे थे और मीडिया के ज़रिए विकास का मायाजाल बुनकर भरमा रहे थे, मगर अब उन्हें इस चुनौती से निपटना होगा। ख़तरनाक बात ये है कि ये ख़तरा अंदर से पैदा होने वाला है और इसे वो लालू आया का भय दिखाकर ख़त्म नहीं कर सकते।

मोदी जी, दिल्ली अभी दूर है...

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नरेंद्र मोदीबीजेपी में सत्ता का हस्तांतरण हो गया है, बल्कि ये कहना चाहिए कि कर दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पार्टी नेतृत्व और लोकतंत्र को ताख पर रखते हुए तय कर दिया कि नितिन गडकरी बतौर अध्यक्ष पार्टी की अगुआई करेंगे और नरेंद्र मोदी भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार। संघ ने वरिष्ठ नेताओं को भरोसे में लेने की ज़रूरत तक नहीं समझी और इस मामले में उनकी इस कदर उपेक्षा की मानो उनका अस्तित्व ही न हो। लेकिन इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। निरंकुश ढंग से अपने फैसलों को थोपने की उसकी आदत रही है और बीजेपी नेता इसे स्वीकार भी करते रहे हैं। केवल अटल बिहारी वाजपेयी थे जो संघ को उसकी जगह पर रखने का साहस दिखा पाते थे और वो भी कभी-कभार। बाकी सबने उसके सामने नतमस्तक रहने में ही भलाई समझी है। ये स्वाभाविक भी है क्योंकि बीजेपी का हाईकमान संघ रहा है और उसकी सर्वोच्चता निर्विवाद है। वास्तव में सत्ता हस्तांतरण की ये घटना संघ और बीजेपी दोनों के चरित्र को स्पष्ट करने के लिए काफी है।  
गौर करने वाली बात ये है कि बीजेपी में नेतृत्व थोपने की ये कार्रवाई बेशक संघ ने की हो मगर इसके पीछे नरेंद्र मोदी दंभी व्यक्तित्व और कद-काठी काम कर रही है। मोदी ने पार्टी में सर्वोच्च हैसियत सबकी सहमति से नहीं बलपूर्वक हासिल की है। उन्होंने पार्टी नेतृत्व की लगातार उपेक्षा की, पार्टी को ठेंगे पर रखा और यहाँ तक कि संघ को भी सिर नहीं उठाने दिया। पार्टी और आला नेताओं को तवज्जो न देकर और अपनी शर्तों पर अड़े रहकर उन्होंने ये मनवा लिया है कि अब उनका कोई विकल्प पार्टी के पास नहीं है, उसे उन्हें स्वीकार करना ही होगा। यहाँ तक कि उन्होंने आरएसएस को भी जता दिया कि उसे मोदी की ज़रूरत है मोदी को आरएसएस की नहीं। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संजय जोशी की बलि चढ़ाकर भी मोदी को महत्वपूर्ण भूमिका सौंपने का फैसला किया। ध्यान रहे बीजेपी के किसी नेता में ये दम नहीं था। लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री बनने का लोभ तो बार बार ज़ाहिर किया मगर उनके पास ऐसा कुछ नहीं बचा जिसके दम पर वे पार्टी या संघ को अपने पीछे खड़े होने के लिए मजबूर कर सकें। सुष्मा स्वराज की स्थिति भी कमोबेश यही है। वे एक उदार और सुशील महिला की छवि लेकर अपना दावा बेशक पेश करती रहें मगर सत्ता छीनने की औकात उनमें नहीं है। इसीलिए वे मुँह फुलाकर अपने गुस्से का इज़हार करने के अलावा कुछ नहीं कर सकतीं। अरुण जेटली तो और भी कमज़ोर विकेट पर हैं। वे रणनीतिकार हैं, लोकप्रिय नेता नहीं, इसलिए उनके पास सत्ता छीनने की ताकत भी नहीं है।
खुद को बीजेपी के एकछत्र नेता के रूप में पेश करते मोदी अब बीजेपी का नया चेहरा हैं, वही उसकी पहचान हैं। हिंदुत्ववादी पार्टी के नए ब्रांड हैं मोदी। भले ही उनके दामन में गुजरात दंगे के दाग़ लगे हों, भले ही वे निरंकुश दिखते हों और उनकी बातों से अहंकार टपकता हो, मगर सचाई यही है कि संघ परिवार ने मोदी पर दाँव लगा दिया है। ये नई भूमिका उन्हें और भी दबंग, अहंकारी बना सकती है और अपने विरोधियों के प्रति वे निर्मम भी हो सकते हैं। इससे पार्टी के अंदर गृहयुद्ध और बढ़ सकता है, क्योंकि उनकी कार्यशैली को पचा पाने वाले लोग बहुत कम हैं। मोदी एको अहम् द्वितीयो नास्ति के सोच वाले व्यक्ति हैं और सबको साथ लेकर चलने की उदारता या हुनर उनके पास नहीं है। गुजरात में जिस तरह से उन्होंने बीजेपी के तमाम नेताओं को ध्वस्त किया है, वो इसकी मिसाल है। वहाँ हर बड़ा नेता उनके ख़िलाफ़ खड़ा है। उनके सामने संगठन का भी कोई वजूद नहीं है। हर तरफ सिर्फ वे ही वे हैं। ये हिटलरी प्रवृत्ति है, जो या तो पार्टी को पार लगा सकती है या फिर उसे बीच भँवर में डुबा सकती है।
एनडीए के घटक दलों को मोदी स्वीकार होंगे या नहीं ये बाद की बात है। हो सकता है न स्वीकारें। दूसरे दावेदारों की रणनीति अब इसी कमज़ोर कड़ी पर केंद्रित रहेंगी। मगर ये भी हो सकता है कि सत्ता का लोभ सहयोगी दलों को समझौता करने के लिए विवश कर दे। नीतीश कुमार भले ही मोदी विरोधी तेवर दिखाने में सबसे आगे रहे हों मगर वे संघ के दरबार में हाज़िरी भी रहे हैं इसलिए उनके विरोध को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। वे कभी भी पलटी खा सकते हैं। वैसे काफी कुछ चुनाव के नतीजों और उसके बाद उभरने वाले समीकरणों पर भी निर्भर करेगा। अगर मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ठीक-ठाक सीटें लाने में कामयाब हो जाती है तो प्रतिकूल दिखने वाले बहुत से समीकरण एकदम से पलट सकते हैं। लेकिन अभी तो यही कहना चाहिए कि पार्टी का किला फतह कर लेने के बावजूद मोदी के लिए दिल्ली अभी दूर है।

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